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ईरान और इज़राइल युद्ध की आग और रसोई की राख – कहाँ है समाधान - रोहित कुमार कनौजिया

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 ईरान और इज़राइल युद्ध की आग और रसोई की राख – कहाँ है समाधान - रोहित कुमार कनौजिया  मध्य पूर्व में ईरान और इज़राइल के बीच गहराते युद्ध के बादलों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत की रसोई में भी चिंता की लहर पैदा कर दी है। एक तरफ सीमा पार मिसाइलें बरस रही हैं, तो दूसरी तरफ भारत के आम आदमी की जेब पर महंगाई का बम फूटने को तैयार है। अखिल भारतीय धोबी महासंघ के प्रदेश मीडिया प्रभारी और किसान नेता रोहित कुमार कनौजिया का ताजा बयान सरकार के लिए एक आईना भी है और चेतावनी भी। जब एक किसान नेता यह कहता है कि "हमनें तो अपने घर में मिट्टी के चूल्हे बनवा लिए हैं," तो यह केवल एक व्यक्तिगत फैसला नहीं, बल्कि देश की ऊर्जा सुरक्षा और वितरण प्रणाली पर एक गहरा कटाक्ष है। सरकार की विफलता या कूटनीतिक मजबूरी? पेट्रोल, डीजल और एलपीजी गैस की समय पर उपलब्धता न होना सीधे तौर पर मध्यम वर्ग, छात्रों और रेहड़ी-पटरी वालों की कमर तोड़ रहा है। मोदी सरकार 'उज्ज्वला योजना' का ढिंढोरा पीटती है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जब आपूर्ति श्रृंखला बाधित होती है, तो गरीब एक बार फिर धुएं और लकड़ी की ओर लौटने को ...

रोहित कुमार कनौजिया का यह तर्क व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की मांग करता है।

क्या भारत 'कृषि प्रधान' से 'जाति प्रधान' देश बन गया है? भारत को सदियों से 'कृषि प्रधान देश' के रूप में जाना जाता रहा है। गाँवों की मिट्टी, किसानों का पसीना और फसलों की हरियाली ही इस राष्ट्र की असली पहचान मानी जाती थी। लेकिन किसान नेता रोहित कुमार कनौजिया के ताजा बयान ने एक कड़वी हकीकत की ओर इशारा किया है। उनका मानना है कि आज का भारत अपनी इस गौरवशाली पहचान को खोकर 'जाति प्रधान' होता जा रहा है। तहसील: जातिवाद की जन्मस्थली? कनौजिया ने जातिवाद के उन्मूलन के लिए एक बहुत ही बुनियादी और प्रशासनिक तर्क दिया है। उनके अनुसार, "जब तक देशभर की हर तहसील में तहसीलदार जाति प्रमाण पत्र बांटता रहेगा, तब तक देश से जातिवाद कभी खत्म नहीं होगा।" यह बयान इस बात पर जोर देता है कि: प्रशासनिक मुहर: जातिवाद केवल समाज की सोच में नहीं, बल्कि सरकारी कागजों में भी सुरक्षित है। पहचान का संकट: एक व्यक्ति की योग्यता और उसका कौशल अक्सर उसके जाति प्रमाण पत्र के पीछे दब जाता है। विभाजनकारी व्यवस्था: जिस दिन से एक बच्चे को सरकारी दस्तावेजों में किसी विशेष जाति का ठप्पा मिल जाता है...

मिट्टी की कोई जाति नहीं होती, फिर किसान जातियों में क्यों बंटा है?

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सत्ता की दहलीज पर खड़ा किसान और पहचान का संकट भारतीय कृषि आज उस चौराहे पर खड़ी है जहाँ एक तरफ तकनीक और 'अमृत काल' के बड़े-बड़े वादे हैं, तो दूसरी तरफ मिट्टी से जुड़ा वह इंसान, जो अपनी पहचान बचाने की जद्दोजहद में लगा है। हाल ही में किसान नेता रोहित कुमार कनौजिया का बयान न केवल सरकार के लिए एक चुनौती है, बल्कि किसान समुदाय के लिए एक कड़वा आईना भी है। जाति का जहर और किसानी का हक कनौजिया का यह कहना कि "अगर किसान जातियों में बंट जाएगा, तो उसकी पूछने वाला कोई नहीं बचेगा," आज के दौर की सबसे बड़ी राजनीतिक सच्चाई है। सत्ता हमेशा से 'बांटो और राज करो' की नीति पर चलती रही है। जब किसान अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरता है, तो अक्सर उसे क्षेत्रीय, जातीय या धार्मिक चश्मे से देखने की कोशिश की जाती है ताकि आंदोलन की धार कुंद की जा सके। कनौजिया ने साफ कर दिया है कि खेत की मिट्टी किसी का सरनेम नहीं पूछती। जब सूखा पड़ता है या फसल का सही दाम नहीं मिलता, तो वह किसी विशेष जाति को देखकर नहीं मिलता। ऐसे में अगर किसान अपनी लड़ाई को जातियों के खांचों में बांट देगा, तो वह दिल्ली के गलियारों में...

सियासी नशे पर भारी पड़ता अस्पताल का 'लाल लहू - रोहित कुमार कनौजिया उस वक़्त उतर जाता है, जब अस्पताल में सिर्फ़ खून की ज़रूरत पड़ती है।

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सियासी नशे पर भारी पड़ता अस्पताल का 'लाल लहू संपादक की कलम से सहयोग: रोहित कुमार कनौजिया, सिटीज़न वॉयस संवाददाता, औरास उन्नाव उन्नाव। औरास विकास खंड के क्षेत्रीय मुद्दों और किसानों की आवाज़ बुलंद करने वाले प्रखर किसान नेता रोहित कुमार कनौजिया ने वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिवेश पर एक तीखा प्रहार किया है। हाल ही में एक जनसंवाद के दौरान उन्होंने भाजपा सरकार की नीतियों और समाज में फैलते धार्मिक व जातिगत उन्माद पर कटाक्ष करते हुए कहा कि, "धर्म और जाति का नशा उस वक़्त उतर जाता है, जब अस्पताल में सिर्फ़ खून की ज़रूरत पड़ती है।" रोहित कुमार कनौजिया का यह बयान उस समय आया है जब समाज में विकास और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे बुनियादी मुद्दों के बजाय पहचान की राजनीति को हवा दी जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि औरास और हसनगंज जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की दरकार है, जबकि राजनीति केवल भावनाओं के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई है। अस्पताल की दहलीज और कड़वी हकीकत संपादकीय दृष्टि से देखें तो यह कथन उस कड़वे सच को उजागर करता है जिसे अक्सर चुनावी रैलियों में द...

भारतीय राजनीति में सियासत का 'नशा' और अस्पताल की 'हकीकत - रोहित कुमार कनौजिया

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 भारतीय राजनीति में सियासत का 'नशा' और अस्पताल की 'हकीकत - रोहित कुमार कनौजिया  आज के दौर में राजनीति का स्वरूप बदल चुका है। सत्ता के गलियारों से लेकर गलियों की चर्चाओं तक, अक्सर 'धर्म' और 'जाति' के नाम पर भावनाओं का सैलाब उमड़ता दिखता है। लेकिन इस शोर-शराबे के बीच किसान नेता रोहित कुमार कनौजिया ने एक ऐसी कड़वी सच्चाई को उजागर किया है, जो सत्ता के दावों और सामाजिक बँटवारे की जड़ों पर प्रहार करती है। उनका कहना है कि "भाजपा सरकार और राजनीति द्वारा चढ़ाया गया धर्म और जाति का नशा उस वक्त उतर जाता है, जब अस्पताल में सिर्फ खून की जरूरत पड़ती है।" यह वाक्य वर्तमान व्यवस्था और समाज के अंतर्विरोधों पर एक गहरा कटाक्ष है। सत्ता का चश्मा बनाम जनता का दर्द पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि किस तरह विमर्श के केंद्र में विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य के बजाय पहचान की राजनीति (Identity Politics) को खड़ा कर दिया गया है। जब चुनाव आते हैं, तो जातिगत समीकरण और धार्मिक ध्रुवीकरण की बिसात बिछाई जाती है। लेकिन क्या यह 'नशा' उस वक्त काम आता है जब किसी परिवा...

रगों में दौड़ता लहू और खोखली होती दीवारें - रोहित कुमार कनौजिया

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रगों में दौड़ता लहू और खोखली होती दीवारें आज के दौर में जहाँ सोशल मीडिया की बहस और राजनीतिक रैलियां धर्म और जाति के नाम पर समाज को बांटने का काम कर रही हैं, वहाँ किसान नेता रोहित कुमार कनौजिया का एक कथन ठंडे पानी के छींटे की तरह हमें हकीकत से रूबरू कराता है। उन्होंने कहा है कि "हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई एकता और धर्म-जाति का नशा उस वक्त उतर जाता है, जब अस्पताल में सिर्फ खून की जरूरत पड़ती है।" यह वाक्य मात्र शब्दों का समूह नहीं, बल्कि उस मानवीय सच्चाई का आईना है जिसे हम अक्सर अहंकार की धुंध में भूल जाते हैं। जब सांसे दांव पर होती हैं... जब अस्पताल के गलियारे में कोई अपने प्रियजन की जिंदगी के लिए जद्दोजहद कर रहा होता है, तब वहां खड़ा व्यक्ति यह नहीं पूछता कि डोनर (रक्तदाता) मंदिर से आया है या मस्जिद से। उस वक्त 'ए-पॉजिटिव' या 'ओ-नेगेटिव' ही सबसे बड़ा धर्म बन जाता है। जीवन और मृत्यु के उस मोड़ पर न तो जाति का गौरव काम आता है और न ही सांप्रदायिक श्रेष्ठता का नशा। हम कहाँ चूक रहे हैं? दिखावे की नफरत: हम बाहर की दुनिया में धर्म के नाम पर दीवारें खड़ी करते है...

आधुनिकता की वेदी पर दम तोड़ते संस्कार और सिसकती देहलियां : रोहित कुमार कनौजिया की कलम से

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लेखक रोहित कुमार कनौजिया की कलम से "इजाजत हो तो लिफाफे में रखकर कुछ वक्त भेज दूं, सुना है कुछ लोगों को फुर्सत नहीं है अपनों से बात करने की!" आहिस्ता-आहिस्ता बदलता यह दौर जिंदगी के हर मोड़ पर एक ऐसा अनुभव करा रहा है, जिसकी कल्पना शायद हमारी पिछली पीढ़ी ने कभी नहीं की थी। वक्त की अहमियत को तो सदियों से सलाम किया जाता रहा है, लेकिन वर्तमान जिस तरह का इम्तिहान ले रहा है, वह किसी त्रासद अजूबे से कम नहीं। विडंबना देखिए कि आज की पीढ़ी जिन तर्कों को 'प्रगति' कहकर पेश कर रही है, उनमें खोखलेपन के सिवा कुछ भी नहीं। आधुनिकता के चमकीले आवरण में आज मानवीय संबंधों का सरेआम चीर-हरण हो रहा है और विवशता की चौखट पर खड़ा हर घर का मुखिया आज मौन रुदन कर रहा है। बदलते परिवेश का दंश आज का मंजर कितना अजीब है! जिस बेटे की उंगली पकड़कर पिता ने उसे चलना सिखाया, वही बेटा आज 'एकल परिवार' के मोह में अपने अस्तित्व की जड़ें काटने पर आमादा है। तथाकथित 'आधुनिक फैशन' के नाम पर मर्यादाओं की सीमाएं लांघी जा रही हैं। गांव के शांत और पवित्र माहौल में, शहरी कोलाहल से दूर एक मजबूर बाप आज आधुनि...