मिट्टी की कोई जाति नहीं होती, फिर किसान जातियों में क्यों बंटा है?
सत्ता की दहलीज पर खड़ा किसान और पहचान का संकट
भारतीय कृषि आज उस चौराहे पर खड़ी है जहाँ एक तरफ तकनीक और 'अमृत काल' के बड़े-बड़े वादे हैं, तो दूसरी तरफ मिट्टी से जुड़ा वह इंसान, जो अपनी पहचान बचाने की जद्दोजहद में लगा है। हाल ही में किसान नेता रोहित कुमार कनौजिया का बयान न केवल सरकार के लिए एक चुनौती है, बल्कि किसान समुदाय के लिए एक कड़वा आईना भी है।
जाति का जहर और किसानी का हक
कनौजिया का यह कहना कि "अगर किसान जातियों में बंट जाएगा, तो उसकी पूछने वाला कोई नहीं बचेगा," आज के दौर की सबसे बड़ी राजनीतिक सच्चाई है। सत्ता हमेशा से 'बांटो और राज करो' की नीति पर चलती रही है। जब किसान अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरता है, तो अक्सर उसे क्षेत्रीय, जातीय या धार्मिक चश्मे से देखने की कोशिश की जाती है ताकि आंदोलन की धार कुंद की जा सके।
कनौजिया ने साफ कर दिया है कि खेत की मिट्टी किसी का सरनेम नहीं पूछती। जब सूखा पड़ता है या फसल का सही दाम नहीं मिलता, तो वह किसी विशेष जाति को देखकर नहीं मिलता। ऐसे में अगर किसान अपनी लड़ाई को जातियों के खांचों में बांट देगा, तो वह दिल्ली के गलियारों में केवल एक 'वोट बैंक' बनकर रह जाएगा, 'अन्नदाता' नहीं।
मोदी सरकार से सीधे सवाल
रोहित कुमार कनौजिया के तेवर केंद्र की मोदी सरकार की उन नीतियों पर सीधा प्रहार करते हैं, जो दावों में तो किसान-हितैषी हैं, लेकिन धरातल पर सवालिया निशान खड़ा करती हैं:
MSP की गारंटी कहाँ है? सरकार ने कानून तो वापस लिए, लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी का वादा आज भी फाइलों में क्यों दबा है?
खेतिहर मजदूर की सुध कौन लेगा? कनौजिया ने सही पकड़ा है कि किसान केवल वह नहीं जिसके पास जमीन है, बल्कि वह भी है जो पसीना बहाता है। क्या सरकार की योजनाएं इस अंतिम पायदान के व्यक्ति तक पहुँच रही हैं?
कर्ज और आत्महत्या का सिलसिला: 'डबल इनकम' का सपना दिखाने वाली सरकार क्या इस बात का जवाब देगी कि आज भी किसान कर्ज के दलदल से बाहर क्यों नहीं निकल पा रहा है?
पहचान की नई परिभाषा
लेख का सबसे मर्मस्पर्शी हिस्सा वह है जहाँ कनौजिया कहते हैं— "अगर तुम खेती-किसानी करते हो... तो तुम किसान हो; पहले किसान बनकर रहो।" यह आह्वान एक नई एकता का है। यह संदेश है कि सत्ता की लाठी और राजनीति की बिसात से बचने का एकमात्र रास्ता 'संगठन' है।
"किसान की कोई जाति नहीं होती, उसकी केवल एक ही पहचान है— उसकी मेहनत और उसकी मांग।"
रोहित कुमार कनौजिया की चेतावनी स्पष्ट है। अगर किसान ने खुद को जातियों और उप-जातियों के छोटे दायरों में कैद कर लिया, तो वह अपना अस्तित्व खो देगा। मोदी सरकार को भी यह समझना होगा कि तीखे सवाल केवल एक नेता के नहीं, बल्कि उस हर व्यक्ति के हैं जो हल थामे खड़ा है। अगर सरकार ने इन सवालों का समाधान संवाद से नहीं निकाला, तो संगठित किसान का आक्रोश सत्ता की नींव हिलाने का माद्दा रखता है
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