रोहित कुमार कनौजिया का यह तर्क व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की मांग करता है।
क्या भारत 'कृषि प्रधान' से 'जाति प्रधान' देश बन गया है?
भारत को सदियों से 'कृषि प्रधान देश' के रूप में जाना जाता रहा है। गाँवों की मिट्टी, किसानों का पसीना और फसलों की हरियाली ही इस राष्ट्र की असली पहचान मानी जाती थी। लेकिन किसान नेता रोहित कुमार कनौजिया के ताजा बयान ने एक कड़वी हकीकत की ओर इशारा किया है। उनका मानना है कि आज का भारत अपनी इस गौरवशाली पहचान को खोकर 'जाति प्रधान' होता जा रहा है।
तहसील: जातिवाद की जन्मस्थली?
कनौजिया ने जातिवाद के उन्मूलन के लिए एक बहुत ही बुनियादी और प्रशासनिक तर्क दिया है। उनके अनुसार, "जब तक देशभर की हर तहसील में तहसीलदार जाति प्रमाण पत्र बांटता रहेगा, तब तक देश से जातिवाद कभी खत्म नहीं होगा।"
यह बयान इस बात पर जोर देता है कि:
प्रशासनिक मुहर: जातिवाद केवल समाज की सोच में नहीं, बल्कि सरकारी कागजों में भी सुरक्षित है।
पहचान का संकट: एक व्यक्ति की योग्यता और उसका कौशल अक्सर उसके जाति प्रमाण पत्र के पीछे दब जाता है।
विभाजनकारी व्यवस्था: जिस दिन से एक बच्चे को सरकारी दस्तावेजों में किसी विशेष जाति का ठप्पा मिल जाता है, उसी दिन से समाज में 'समानता' की दीवार ढहनी शुरू हो जाती है।
कृषि बनाम जाति: एक वैचारिक टकराव
किसान नेता का यह कहना कि देश अब 'जाति प्रधान' हो गया है, इस चिंता को दर्शाता है कि आज किसान की समस्याओं—जैसे एमएसपी (MSP), सिंचाई और कर्ज—से ज्यादा महत्व चुनावी राजनीति में जातिगत समीकरणों को दिया जा रहा है। जब समाज जाति के आधार पर बंटता है, तो किसान की सामूहिक शक्ति भी बिखर जाती है।
क्या है समाधान?
रोहित कुमार कनौजिया का यह तर्क व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की मांग करता है। उनका संदेश स्पष्ट है:
"यदि हम वास्तव में एक आधुनिक और विकसित भारत का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें कागजों से जाति को हटाकर इंसानियत और राष्ट्रीयता को प्राथमिकता देनी होगी।"
निष्कर्ष
जातिवाद का जहर समाज के हर अंग में फैला हुआ है, और प्रशासनिक रूप से इसे मान्यता देना कहीं न कहीं इसे और मजबूत बनाता है। रोहित कुमार कनौजिया का यह बयान एक आह्वान है—एक ऐसे भारत की ओर लौटने का जहाँ पहचान हल चलाने वाले 'किसान' से हो, न कि तहसील से मिलने वाले 'जाति प्रमाण पत्र' से।
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