रगों में दौड़ता लहू और खोखली होती दीवारें - रोहित कुमार कनौजिया
रगों में दौड़ता लहू और खोखली होती दीवारें
आज के दौर में जहाँ सोशल मीडिया की बहस और राजनीतिक रैलियां धर्म और जाति के नाम पर समाज को बांटने का काम कर रही हैं, वहाँ किसान नेता रोहित कुमार कनौजिया का एक कथन ठंडे पानी के छींटे की तरह हमें हकीकत से रूबरू कराता है। उन्होंने कहा है कि "हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई एकता और धर्म-जाति का नशा उस वक्त उतर जाता है, जब अस्पताल में सिर्फ खून की जरूरत पड़ती है।"
यह वाक्य मात्र शब्दों का समूह नहीं, बल्कि उस मानवीय सच्चाई का आईना है जिसे हम अक्सर अहंकार की धुंध में भूल जाते हैं।
जब सांसे दांव पर होती हैं...
जब अस्पताल के गलियारे में कोई अपने प्रियजन की जिंदगी के लिए जद्दोजहद कर रहा होता है, तब वहां खड़ा व्यक्ति यह नहीं पूछता कि डोनर (रक्तदाता) मंदिर से आया है या मस्जिद से। उस वक्त 'ए-पॉजिटिव' या 'ओ-नेगेटिव' ही सबसे बड़ा धर्म बन जाता है। जीवन और मृत्यु के उस मोड़ पर न तो जाति का गौरव काम आता है और न ही सांप्रदायिक श्रेष्ठता का नशा।
हम कहाँ चूक रहे हैं?
दिखावे की नफरत: हम बाहर की दुनिया में धर्म के नाम पर दीवारें खड़ी करते हैं, लेकिन हमारे भीतर बहने वाला रक्त एक ही लाल रंग का है।
सियासी चश्मा: अक्सर हम अपनी पहचान को धर्म और जाति के संकुचित दायरे में कैद कर लेते हैं, जबकि कुदरत ने हमें सिर्फ 'इंसान' बनाकर भेजा था।
संकट का बोध: यह विडंबना ही है कि हमें अपनी एकता और इंसानियत याद आने के लिए किसी बड़े संकट या अस्पताल की दहलीज की जरूरत पड़ती है।
एकता का असली आधार
किसान आंदोलन हो या कोई सामाजिक आपदा, भारतीय समाज ने हमेशा दिखाया है कि जब बात 'पेट की आग' या 'सांसों की डोर' पर आती है, तो हम सब एक होते हैं। रोहित कुमार कनौजिया जी का यह बयान हमें चेतावनी देता है कि हम उस 'नशे' से मुक्त हों जो हमें आपस में लड़वाता है।
निष्कर्ष:
अस्पताल का वह बेड हमें सिखाता है कि हम सब मिट्टी के पुतले हैं और एक-दूसरे के सहयोग के बिना हमारा अस्तित्व अधूरा है। यदि हम अस्पताल के बाहर भी उसी 'रक्त की एकता' को समझ लें, तो नफरत की दुकानें अपने आप बंद हो जाएंगी। इंसानियत ही वह खून है जो समाज की धमनियों में बहना चाहिए।
"रिश्ते खून के हों या न हों, पर ज़रूरत पड़ने पर खून ही सबसे बड़ा रिश्ता बन जाता है। धर्म और जाति के चश्मे उतार कर देखिए, दुनिया बहुत खूबसूरत और एक है।"
मैं हूँ रोहित कुमार कनौजिया, जय हिंद, जय जवान, जय किसान!"
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