आधुनिकता की वेदी पर दम तोड़ते संस्कार और सिसकती देहलियां : रोहित कुमार कनौजिया की कलम से
लेखक रोहित कुमार कनौजिया की कलम से
"इजाजत हो तो लिफाफे में रखकर कुछ वक्त भेज दूं,
सुना है कुछ लोगों को फुर्सत नहीं है अपनों से बात करने की!"
आहिस्ता-आहिस्ता बदलता यह दौर जिंदगी के हर मोड़ पर एक ऐसा अनुभव करा रहा है, जिसकी कल्पना शायद हमारी पिछली पीढ़ी ने कभी नहीं की थी। वक्त की अहमियत को तो सदियों से सलाम किया जाता रहा है, लेकिन वर्तमान जिस तरह का इम्तिहान ले रहा है, वह किसी त्रासद अजूबे से कम नहीं। विडंबना देखिए कि आज की पीढ़ी जिन तर्कों को 'प्रगति' कहकर पेश कर रही है, उनमें खोखलेपन के सिवा कुछ भी नहीं। आधुनिकता के चमकीले आवरण में आज मानवीय संबंधों का सरेआम चीर-हरण हो रहा है और विवशता की चौखट पर खड़ा हर घर का मुखिया आज मौन रुदन कर रहा है।
बदलते परिवेश का दंश
आज का मंजर कितना अजीब है! जिस बेटे की उंगली पकड़कर पिता ने उसे चलना सिखाया, वही बेटा आज 'एकल परिवार' के मोह में अपने अस्तित्व की जड़ें काटने पर आमादा है। तथाकथित 'आधुनिक फैशन' के नाम पर मर्यादाओं की सीमाएं लांघी जा रही हैं। गांव के शांत और पवित्र माहौल में, शहरी कोलाहल से दूर एक मजबूर बाप आज आधुनिकता के इस 'श्राप' का शिकार होकर पश्चाताप के आंसू पी रहा है। सोच के समंदर में उठती ख्वाहिशों की लहरें जब तक दर्द के साहिल तक पहुंचती हैं, तब तक जिंदगी के हसीन सपने स्वार्थ की सुनामी में दम तोड़ चुके होते हैं।
उम्मीदों का कत्ल और बुढ़ापे की वीरानी
एक पिता अपनी औलाद के भविष्य को संवारने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता है। उसके मन में बस एक छोटी सी आस होती है कि जिंदगी की ढलती शाम में यह औलाद उजाला बनकर आएगी और जब तबाही की घनघोर निशा दस्तक देगी, तब वह आखिरी मंजिल का हमराही बनेगी। लेकिन जब यही उम्मीद अपनों के हाथों ही जख्मी होती है, तो आत्मा कराह उठती है। तब भरी दोपहरी में भी अंधकार का आभास होने लगता है।
वृद्धाश्रम और पुश्तैनी देहलियों का सन्नाटा
आज हकीकत हर घर की कमोबेश यही है। कुछ लोग तथाकथित 'मान-सम्मान' को बचाने के लिए वृद्धाश्रमों में शरण लिए हुए हैं, तो कुछ अपनी ही पुश्तैनी दहलीज पर अपनों की नफरत और बेरुखी का शिकार होकर अधिकार विहीन बने बैठे हैं। कल तक जिनके लिए अपना वजूद मिटा दिया, आज उन्हीं की बेरुखी तबाही की इबारत लिख रही है। न मान रहा, न शान रही और न ही स्वाभिमान; बस कदम-कदम पर एक कठिन इम्तिहान रह गया है।
खोखली शिक्षा और संस्कारों का अकाल
ऐसी शिक्षा, दीक्षा और परीक्षा आखिर किस काम की, जो मां-बाप को तन्हाई में तड़पने के लिए छोड़ दे? जो कल तक पल्लू पकड़कर चलते थे, आज वे ही पराए हो गए हैं। यह कोई साधारण इबारत नहीं, बल्कि अश्कों से भीगी उन हताश और निराश लोगों की दास्तां है, जिनका कभी जमाने में रुतबा हुआ करता था, जिनकी एक हनक से दुनिया ठहर जाती थी। मगर आज विधाता ने उन्हें ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया है जहां सिर्फ तन्हाई और अपनों की बेवफाई है। जीवन भर की कमाई, धन-संपत्ति और वह रुतबा—आज कुछ भी काम नहीं आ रहा।
ऐसी औलाद पर लानत है, जिसकी मौजूदगी में मां-बाप का अंतिम सफर दारुण कहानी बन जाए। याद रखिए, 'कर्म-फल' से कोई नहीं बच पाया है; जो बीज आज आप बो रहे हैं, उसकी फसल कल आपको ही काटनी होगी। समय रहते संभल जाइए, क्योंकि वक्त किसी का इंतजार नहीं करता। रिश्तों की डोर को थाम लीजिए, वरना सावधानी हटी तो जीवन की सबसे बड़ी दुर्घटना घटनी तय है।
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