भारतीय राजनीति में सियासत का 'नशा' और अस्पताल की 'हकीकत - रोहित कुमार कनौजिया

 भारतीय राजनीति में सियासत का 'नशा' और अस्पताल की 'हकीकत - रोहित कुमार कनौजिया 
आज के दौर में राजनीति का स्वरूप बदल चुका है। सत्ता के गलियारों से लेकर गलियों की चर्चाओं तक, अक्सर 'धर्म' और 'जाति' के नाम पर भावनाओं का सैलाब उमड़ता दिखता है। लेकिन इस शोर-शराबे के बीच किसान नेता रोहित कुमार कनौजिया ने एक ऐसी कड़वी सच्चाई को उजागर किया है, जो सत्ता के दावों और सामाजिक बँटवारे की जड़ों पर प्रहार करती है। उनका कहना है कि "भाजपा सरकार और राजनीति द्वारा चढ़ाया गया धर्म और जाति का नशा उस वक्त उतर जाता है, जब अस्पताल में सिर्फ खून की जरूरत पड़ती है।"
यह वाक्य वर्तमान व्यवस्था और समाज के अंतर्विरोधों पर एक गहरा कटाक्ष है।
सत्ता का चश्मा बनाम जनता का दर्द
पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि किस तरह विमर्श के केंद्र में विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य के बजाय पहचान की राजनीति (Identity Politics) को खड़ा कर दिया गया है। जब चुनाव आते हैं, तो जातिगत समीकरण और धार्मिक ध्रुवीकरण की बिसात बिछाई जाती है। लेकिन क्या यह 'नशा' उस वक्त काम आता है जब किसी परिवार का सदस्य अस्पताल के स्ट्रेचर पर जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा होता है?
ऑक्सीजन और रक्त का कोई धर्म नहीं होता
इतिहास गवाह है, चाहे वह महामारी का दौर हो या कोई सामान्य चिकित्सा संकट, अस्पताल के वेटिंग रूम में बैठा व्यक्ति यह नहीं पूछता कि जो खून की बोतल उसके मरीज को चढ़ाई जा रही है, वह किस मजहब के इंसान के शरीर से आई है। उस वक्त 'राम' और 'रहीम' का अंतर मिट जाता है और केवल 'प्राण' बचाने की छटपटाहट शेष रह जाती है।
रोहित कुमार कनौजिया जी का यह प्रहार सीधा उन ताकतों पर है जो चुनावी लाभ के लिए समाज को खानों में बांटती हैं। उनका तर्क स्पष्ट है: जो व्यवस्था हमें जाति और धर्म के नाम पर लड़ाती है, वह संकट के समय हमें केवल एक 'बेड नंबर' बनाकर छोड़ देती है।
किसान और आम आदमी की असल जरूरतें
एक किसान नेता के तौर पर रोहित जी ने यह बखूबी समझा है कि खेतों की सिंचाई, फसलों के दाम और बच्चों का इलाज किसी खास धर्म या जाति का मुद्दा नहीं है। यह बुनियादी जरूरतें हैं। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन यदि अस्पताल में दवा, डॉक्टर और पर्याप्त रक्त की व्यवस्था नहीं है, तो जाति और धर्म के नाम पर दिया गया 'गौरव' किसी काम का नहीं रह जाता।

यह लेख उन लोगों के लिए एक चेतावनी है जो राजनीतिक नफे-नुकसान के लिए समाज में वैमनस्य फैलाते हैं। रोहित कुमार कनौजिया जी का यह संदेश हमें याद दिलाता है कि इंसानियत का रंग हमेशा लाल होता है और वह किसी भी सियासी नशे से कहीं ज्यादा गहरा और स्थायी है। समय आ गया है कि हम 'नफरत के नशे' से जागें और 'इंसानियत के हक' की बात करें।
"भाजपा सरकार के दौर में धर्म और जाति की राजनीति का नशा बहुत चढ़ाया गया है, लेकिन किसान नेता रोहित कुमार कनौजिया जी का यह तीखा सवाल सबको सोचना चाहिए— क्या अस्पताल के संकट में जाति काम आती है या इंसानियत? जब खून की जरूरत पड़ती है, तो हर धर्म का पर्दा गिर जाता है।" 🩸✊
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