उन्नाव का बदलता सियासी मिजाजउन्नाव में कभी गूंजता था 'लाल सलाम', अब नई पीढ़ी के लिए अनजान हुआ वामपंथ
उन्नाव का बदलता सियासी मिजाज
उन्नाव में कभी गूंजता था 'लाल सलाम', अब नई पीढ़ी के लिए अनजान हुआ वामपंथ
पुरवा में 'साइकिल' की रफ़्तार बरकरार, पर भीखालाल का 'छक्का' आज भी एक अटूट रिकॉर्ड
उन्नाव। उत्तर प्रदेश की राजनीति में उन्नाव जिला हमेशा से ही दिलचस्प उलटफेरों का गवाह रहा है। लेकिन इस बार की चुनावी चर्चाओं के बीच एक कड़वा सच उभर कर सामने आया है— जिले की राजनीति से 'लाल झंडा' पूरी तरह गायब हो चुका है। जिस धरती ने बाबू भीखालाल जैसे दिग्गज को छह बार विधानसभा भेजा, आज वहां की नई पीढ़ी कम्युनिस्ट पार्टी के नाम तक से वाकिफ नहीं है।
तहसीलदारी छोड़ थामी थी जनसेवा की राह
राजनीति के गलियारों में आज भी बाबू भीखालाल का नाम सम्मान से लिया जाता है। 1957 में तहसीलदार का पद त्याग कर राजनीति में आए भीखालाल ने हसनगंज (अब मोहान) क्षेत्र में ऐसी पैठ बनाई कि जनता ने उन्हें सिर-आंखों पर बिठाया।
- अजेय रिकॉर्ड: वह 1957, 1962, 1967, 1969, 1974 और 1980 में चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे।
- विरासत का अंत: उनके बाद बाबू मस्तराम ने भाजपा के टिकट पर चार बार जीत दर्ज की और मंत्री भी बने, लेकिन लाल झंडे के उस छह बार की जीत के रिकॉर्ड को कोई छू तक नहीं सका।
- बांगरमऊ: दिवंगत गोपीनाथ दीक्षित पांच बार विधायक बने और गृह व वित्त जैसे भारी-भरकम मंत्रालय संभाले, लेकिन उनका जीत का क्रम लगातार नहीं रहा।
- भगवंत नगर: 'उन्नाव के गांधी' कहे जाने वाले भगवती सिंह विशारद चार बार विधायक चुने गए।
- सदर व सफीपुर: इन दोनों सीटों को आज भी किसी एक नेता या दल के लंबे वर्चस्व का इंतजार है।
- हृदयनारायण दीक्षित: निर्दलीय से शुरुआत कर सपा के सारथी बने और चार बार विधायक रहे।
- उदयराज यादव: सपा ने रणनीति बदलते हुए उदयराज पर दांव लगाया, और अब वह पांचवीं बार चुनावी मैदान में हैं।
"आज रामपुर गढौहा के लाल भीखालाल की विरासत को सहेजने वाला कोई नहीं बचा। कम्युनिस्ट पार्टी अब जिले के चुनावी विमर्श से पूरी तरह बाहर है।"
दिग्गजों का गढ़, पर निरंतरता की कमी
जिले की अन्य सीटों पर भी कद्दावर नेताओं का दबदबा रहा, लेकिन भीखालाल जैसी निरंतरता कम ही दिखी:
पुरवा: जहां 'चेहरा' बदला पर 'झंडा' नहीं
जिले की पुरवा विधानसभा सीट एक अलग ही कहानी बयां करती है। यहाँ पिछले सात चुनावों से समाजवादी पार्टी का कब्जा है।
निष्कर्ष: उन्नाव की राजनीति अब 'लाल सलाम' के दौर से निकलकर जातिगत समीकरणों और नए नारों के इर्द-गिर्द सिमट गई है। इतिहास के पन्नों में दर्ज भीखालाल की जीत आज के नेताओं के लिए एक मिसाल भी है और चुनौती भी।
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