जनहित में हुंकार: गरीब किसान-मजदूर ही इस देश का असली मालिक है- रोहित कुमार कनौजिया


जनहित में हुंकार: गरीब किसान-मजदूर ही इस देश का असली मालिक है- रोहित कुमार कनौजिया 
"खेत की मिट्टी में पसीना बहाने वाला और कड़कड़ाती ठंड में सीमा पर खड़े जवान का पेट पालने वाला किसान ही इस लोकतांत्रिक भारत का भाग्यविधाता है। विडंबना यह है कि जो देश की नींव है, वही आज हाशिए पर खड़ा है।"
प्रमुख युवा किसान नेता रोहित कुमार कनौजिया के ये शब्द महज एक बयान नहीं, बल्कि उस कड़वी सच्चाई का आईना हैं जिसे आज का आधुनिक भारत अनदेखा कर रहा है। उनका तर्क सीधा और स्पष्ट है: किसान और मजदूर इस देश के असली मालिक हैं, लेकिन वे अपनी ताकत को भूल बैठे हैं।
सत्ता की चाबी: संगठित होने की जरूरत
रोहित कुमार कनौजिया का मानना है कि लोकतंत्र में 'संख्या बल' ही सबसे बड़ी ताकत होती है। भारत की एक विशाल आबादी कृषि और मजदूरी पर टिकी है। इसके बावजूद, नीतियां बनाते समय इस वर्ग की आवाज सबसे धीमी सुनाई देती है। कनौजिया कहते हैं कि जिस दिन किसान और मजदूर अपनी जाति, धर्म और क्षेत्रीय भेदभाव को भुलाकर एक मंच पर आ गए, उस दिन सत्ता की दिशा और दशा दोनों बदल जाएगी।
मालिक जब 'याचक' बन जाता है
लेख का मुख्य केंद्र उस विसंगति पर है जहाँ अन्नदाता को अपने ही हक के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है। कनौजिया जोर देकर कहते हैं:
 * आत्मसम्मान की कमी: किसान खुद को 'गरीब' और 'बेचारा' समझने लगा है, जबकि वह उत्पादन का केंद्र है।
 * बाजार का चक्रव्यूह: पसीना किसान बहाता है, लेकिन दाम बिचौलिए तय करते हैं।
 * स्मृति लोप: किसान भूल गया है कि सरकारें उससे हैं, वह सरकारों से नहीं।
> "जब तक किसान अपने हाथों के छालों को अपनी कमजोरी समझेगा, वह दबता रहेगा। जिस दिन उसने इन छालों को अपनी मेहनत का तमगा और अपनी ताकत मान लिया, वह इस देश का नेतृत्व करेगा।" — रोहित कुमार कनौजिया
मजदूर: राष्ट्र निर्माण की रीढ़
सिर्फ खेत ही नहीं, शहरों की ऊंची अट्टालिकाओं को खड़ा करने वाला मजदूर भी उसी शोषण का शिकार है। कनौजिया के अनुसार, मजदूर और किसान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब तक मजदूर को उसके पसीने की सही कीमत और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती, तब तक 'विकसित भारत' का सपना अधूरा है।
निष्कर्ष: जागो अन्नदाता!
रोहित कुमार कनौजिया का आह्वान एक नए युग की शुरुआत का संकेत है। यह लेख हमें याद दिलाता है कि यदि देश की धमनियों में दौड़ने वाला खून (किसान-मजदूर) कमजोर पड़ गया, तो पूरा शरीर (राष्ट्र) शिथिल हो जाएगा। अब समय आ गया है कि यह 'मालिक' अपनी शक्ति को पहचाने, शिक्षित बने और संगठित होकर अपने अधिकारों की बात करे।
वक्त आ गया है कि हल चलाने वाला हाथ, अब कलम और सत्ता की कमान भी संभाले।

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